कभी कश्मीर जैसी थी मेनार की फिजा! हर घर से लगता था एक आम का पौधा, ब्रह्मसागर की पाल पर अब गिने-चुने बचे पेड़

माधव मेनारिया उदयपुर 28 सितंबर2026

समय के साथ व्यक्ति अपना हुनर और रंग बदलता है, वैसे ही गांवों की परंपराएं भी बदल रही हैं। कभी ऐसा जमाना था जब मेनार गांव के लोगों का प्रकृति से इतना गहरा प्रेम था कि हर घर से एक व्यक्ति ब्रह्मसागर तालाब और ढंड सागर तालाब की पाल पर आम का पौधा लगाता था।

बुजुर्ग बताते हैं कि इसी परंपरा का नतीजा था कि भीषण ग्रीष्म ऋतु में भी लोग गर्मी से निजात पाने के लिए तालाब की पाल पर जाकर दिन गुजारते थे। घने आम के पेड़ों की ठंडी छांव और लहराते तालाब के जल को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो हम किसी दरिया किनारे सफर कर रहे हों। बुजुर्गों के शब्दों में कहें तो प्रकृति की ऐसी छटा या तो कश्मीर में देखने को मिलती थी या फिर मेनार में।

लेकिन वक्त बदलता गया। आज यह परंपरा विलुप्त होने की कगार पर है। ब्रह्मसागर तालाब की पाल पर नजर दौड़ाई जाए तो मुश्किल से 100 से 120 के आसपास आम के पेड़ बचे हैं। धीरे-धीरे ये पेड़ या तो कीड़ों के कारण या फिर उम्र पूरी होने से अपना वजूद खो रहे हैं।

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि हम लोग लगातार प्रति घर से कम से कम एक आम का पौधा बोया करते थे, लेकिन अब युवा पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में हिचकिचाने लगी है। जरूरत है कि फिर से वही परंपरा लौटे और तालाब की पालें फिर से आम के बागों से लहलहा उठें।

मेनार की पाल पर खत्म होती एक परंपरा: जब हर घर से उगता था कश्मीर जैसा सुकून

गांव सिर्फ मकानों का झुंड नहीं होते, उनकी एक आत्मा होती है। मेनार की आत्मा बसती थी उसके दो तालाबों - ब्रह्मसागर और ढंड सागर की पाल पर।

आज से 50-60 साल पहले का मेनार याद कीजिए। गर्मी अपने चरम पर होती, आसमान से आग बरसती, लेकिन ब्रह्मसागर की पाल पर कदम रखते ही मौसम बदल जाता था। घने आम के पेड़, उनकी ठंडी छांव, नीचे तालाब का ठहरा हुआ पानी और पेड़ों से आती ठंडी हवा। बुजुर्ग बताते हैं, उस ठंडक को देखकर लगता ही नहीं था कि हम राजस्थान में हैं। तब वो कहते थे - "ऐसी फिजा या तो कश्मीर में मिलेगी या हमारे मेनार में।"

हर घर से एक पेड़ - ये था अनलिखा नियम

ये खूबसूरती खुद-ब-खुद नहीं बनी थी। इसके पीछे मेनार के लोगों का एक अनलिखा कानून था। गांव में मान्यता थी कि हर घर से कम से कम एक व्यक्ति को तालाब की पाल पर आम का पौधा लगाना ही है।

शादी हो, बच्चा पैदा हो या कोई मन्नत पूरी हो - लोग तालाब पर पौधा लगाते थे। उस पौधे को अपने बच्चे की तरह पालते थे। यही कारण था कि पूरी पाल आम के बाग में बदल गई थी। लोग इसे "मेनार का एसी" कहते थे। दोपहर में पूरा गांव वहीं आकर बैठता, पंचायतें होतीं, बच्चे खेलते और बुजुर्ग आम की छांव में किस्से सुनाते।


वक्त बदला, सोच बदली।

आज अगर आप ब्रह्मसागर की पाल पर जाओगे तो दिल बैठ जाएगा। जहाँ कभी सैकड़ों आम के पेड़ एक साथ खड़े थे, वहाँ अब गिनती के आम के पेड़ बचे हैं। कई बबूल उग आए हैं,कई पेड़ कीड़ों और उम्र के कारण सूख गए, कई की जगह पर अतिक्रमण हो गया।

सबसे बड़ी चोट परंपरा पर लगी। अब हर घर से पेड़ लगाने वाला रिवाज लगभग विलुप्तहो गया है। युवा भटक गई है , जिसके पास समय है वो मोबाइल में व्यस्त है। तालाब की पाल अब वीरान लगती है।

एक अपील - क्या हम फिर से लौटा सकते हैं वो दिन?*

लेख लिखने का मकसद सिर्फ यादें ताजा करना नहीं है। सवाल ये है कि क्या हम इस परंपरा को फिर से जिंदा कर सकते हैं?

क्यों न गांव के नो जवान युवा आगे आए एवं नई पहल करे - "फिर से हर घर, एक आम"एक नीम का पौधा प्रति परीवार लगाए उसकी जिम्मेदारी ले उसे समय समय पर बच्चे की तरह परवरिश करे। आने वाले पांच साल में ये पौधे बड़े होंगे और हमारी आने वाली पीढ़ी फिर से उसी कश्मीर जैसी ठंडक का एहसास कर पाएगी।

मेनार ने हमेशा अपनी विरासत बचाई है - चाहे वो पक्षियों का गांव हो या पर्यावरण प्रेम। ये आम की परंपरा भी हमारी विरासत है, इसे मरने मत दीजिए।

अगर आप भी चाहते हैं कि ब्रह्मसागर की पाल फिर से हरी-भरी हो, तो इस लेख को शेयर कीजिए और एक पौधा लगाने का संकल्प लीजिए।